Shri Kantha Pranth Yuvak Parishad (R) Trust

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History

आज के भारत को कालांतर में किसी ने जादूगरो का देश, किसी ने सपेरो का देश, किसी ने दुनियां  के मुकुट का मणी तो किसी ने दुनियां को सांस्कृतिक पाठ पढ़ाने वाला बताया | बदलते समय के परीवेश में सोच भी बदलती  रहती है, तब भारत को किसी ने गरीब देश, किसी ने कृषी प्रधान, किसी ने विकाशील, तो किसी अपने उत्पादों  के लिए बड़ा बाजार बताया |  सोच व्यक्ति या देशो के व्यापारिक  स्वार्थ, राजनैतिक प्रतिद्वंदिता एवं सामरिक शक्ति की होड़ तक पहुच जाती है, परन्तु इस वास्तविकता को नाकारा नहीं जा सकता कि शताब्दियों से भारत विश्व में अपनी सास्कृतिक शैली, प्रेम, सोहार्द, सामंजस्यता एवं व्यावहारिक कुशलता के लिए जाना जाता रहा है और इन सबसे बढ़कर विशेषता यह है कि यह सभी चीजे भारत के अलग अलग क्षैत्रो में  अपने अपने ढंग से सतरंगी धनुष के रूप में फैली हुई है | ऐसा ही एक क्षैत्र है 'कांठा प्रान्त' |
हमारे देश की विशेषता यह है कि यहां पर प्रत्येक क्षैत्र (कुछ गाँवो के समुह को अथवा कुछ sq. mile  area में फ़ॆले) को एक विशेष नाम से पुकारा जाता है | और वैसा होने के पिछे बहुत सारे तर्क भी दिये जाते है | 'कांठा प्रान्त' के नामकरण के पीछे भी बहुत सारे तथ्य हो सकते है, हमको जितनी जानकारी प्राप्त हुई है उतना आपके साथ में साँझा करने का प्रयत्न कर रहे है |
ऐसा माना जाता है की 18 वी शताब्दी ( लगभग 1820 ) में तत्कालीन जोधपुर स्टेट के मारवाड़ क्षैत्र दरबार ने खाली पड़ी भूमि पर बबूल के बीजों का रोपारण करवाया था, ( उस समय उस क्षैत्र में पानी की बहुत कमी थी और बबूल कटीली झाड़ीयों की श्रेणी में आता है जिसको पानी की आवश्यकता  बहुत कम होती है ) चुंकी  बबूल पर कांटे बहुत उगते है अत: यह क्षैत्र ' कांठा ' कहलाया |
ऐसा भी माना जाता है कि इस क्षैत्र में निवास करने वाले व्यक्ति सामान्य जन-जीवन में पहनने के लिये रेजा ( कांठा कपड़ा )  के कपड़ो का प्रयोग करते थे अत: यह क्षैत्र कांठा प्रान्त कहलाया |
ऐसी भी मान्यता है कि इस क्षैत्र में कांठा धान ( जॊ - मक्की इत्यादी ) की उत्पादकता ज्यादा थी एवं खाने में उस धान का उपयोग बहुतायत होता था अत: यह क्षैत्र कांठा क्षैत्र कहलाया |
मान्यताए ओर भी हो सकती है परन्तु यह सत्यता जरुर है कि सभी मान्यताओं में कांठा बीज, कांठा धान, कांठा कपड़ा या काँटों का वर्णन जरुर मिलता है अत: इस क्षैत्र का नाम कालांतर में ' कांठा प्रांत ’ पड़ा |
इस क्षैत्र में निवास करने वाले सभी व्यक्ति कांठा प्रांतीय कहलाये | ओसवाल लॊड़ा साजनो की दृष्टी से देखा जाये तो यह क्षैत्र 168 गाँवो तक फैला हुआ था परन्तु कालांतर में यंहा से लॊड़ा साजनो के निर्वासन के कारण यह क्षैत्र 52  गाँवो तक सिमित हो गया ( बाकी के गाँवो में ओसवाल लॊड़ा साजनो के घर नहीं है )
न केवल अपने क्षैत्र में अपितु वहां से निकल कर अन्य क्षैत्रो में जाकर बस चुके कांठा प्रांतीय ओसवाल लॊड़ा साजना महानुभावो ने अपनी व्यवहार कुशलता एवं व्यापारिक चातुर्यता के कारण अपना अलग ही स्थान बनाया है | आज इस प्रांत के ओसवाल लॊड़ा साजना महानुभाव व्यापारिक, शैक्षणिक, सामाजिक एवं राजनैतिक विकास की ओर बहुत ज्यादा अग्रसर है हम आपके विकास के इस पथ पर बहुत आगे बढ़ने की कामना करते है |


हमें बहुत सारी  महत्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध कराने के लियें बैगलोर के समाजसेवी श्रीमान सम्पतराज जी कटारिया को धन्यवाद अर्पित करते है|